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जीवन का हर पल आइसक्रीम की तरह है जो हर घडी हर पल पिघल रहा है । कोई इसको सिर्फ फटाफट ख़त्म कर रहा है, जैसे कोई जल्दी है, कोई सिप करने क़ी कोशिश कर रहा है तो कोई बेमन से काट कर रहा है मुहँ बनाकर या काट रहा है कुछ ही ऐसे लोग हैं जो लुत्फ़ उठा रहे हैं, एक-एक सिप का आनंद रहे हैं ।
अक्सर लोग डरे होते हैं कि आइसक्रीम (जिंदगी) को लेकर। जिंदगी डर के साये में काट रहे हैं खुलकर नही जी रहे हैं । पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं ।
अब तो हर एक फंक्शन की जरुरत है ये आइसक्रीम ! लेकिन 60% लोग स्वीट नहीं खाते हैं डर की वजह से, कुछ लेते हैं अपनी चॉइस की; वनीला, बटरस्कॉच, चॉकलेट फ्लेवर, स्ट्रॉबेरी लाइक , फिर भी डस्ट विन भर ही जाता है इन आइसक्रीम (रुइंड लाइफ) के फ्लेवर्स से और कुछ नैपकिंस और स्पून्स के साथ !
बाकी के 35% लोग कुछ हद तक लुत्फ़ उठा लेते हैं । जबकि 5% ऐसे लोग हैं जो एक-एक बाईट को ऐसे खाते हैं जैसे दुवारा नहीं मिलेगी । ऐसे लोग एक-एक बाईट का मज़ा लेते हैं , कोई रोग नहीं होता हैं, कोई डर नहीं होता है और किसी दबाब में भी नहीं होते !
क्यों ?????
ऐसा क्यों होता है …???
जबकि आपकी चॉइस का था….!!!
क्या कोई जबाब है आपके पास…???
हाँ ! मुझे पता है जबाब है आपके पास और सोंचिये जरा कि यह जायज़ जबाब हैं !!!
हम सब अपनी जिंदगी भी इसी तरह इल्लीगल, इगोस्टिक, नादानी भरे, केयरलेस, फाल्स एस्टीम, मतलबी, निष्ठुर, अहसान करते हुये और अनइथिकल रेप्लाईस के साथ जी रहे हैं ! जिसमें मौलिकता और नैतिकता नाम के ड्राईवर ही नहीं हैं ।
अक्सर लोग एक ऐसा आवरण ओढ़ लेते हैं जो उनको पता ही नहीं होता है कि यह झूठा आवरण है जिसको वो सेल्फ रेस्पेक्ट का नाम देते हैं और यह आवरण उसके द्वारा उसकी परिस्थितियों और अनुभवों के आधार पर बन जाता है जो उस व्यक्ति को पता ही नहीं चलता है । इसी आवरण से ही उसका दृष्टिकोण बनता है । ओवर रिएक्शन्स और निगेटिविटीस का चश्मा उसकी आँखों पर लग जाता है और वो व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति को सिर्फ क्रटिसाइज़ करता है और कमियां निकालने में एक्सपर्ट हो जाता है और जाने अनजाने में सामने वाले इंसान की सेल्फ रेस्पेक्ट को चोट पहुंचा बैठता है ।
दिक्कत यह भी है कि उस व्यक्ति के करीबी उसको खो देने के डर से उसको आइना नहीं दिखा पाते हैं । लेकिन उसके करीबी भी उतने ही बराबर के हिस्सेदार हो जाते हैं ! और जिससे उस व्यक्ति में आत्म-सुधार की गुंजाइश रह जाती है ।
“उस शिक्षा और स्किल का कोई अर्थ नहीं है जिसका आप उपयोग सही ढंग से नहीं कर पाये । सफलता पाने की एक मैकेनिज्म है उस मेकैनिज़्म में कई तरह के टूल्स यूज़ किए जाते हैं ।”
जिस तरह से एक कार में ए. बी. सी होते हैं मतलब “एक्सिलेटर,” “ब्रेक” और “क्लच” होते हैं उसी तरह से अगर हमने भी अपने अंदर इनको इकुप्ड नहीं किया तो हमारी पूरी ज़िन्दगी एक ऐसे ट्रैक पर दौड़ेगी जहाँ सिर्फ एक्सीडेंड ही होंगे और हमेशा चोटें आएँगी । जिसमें शरीर घायल नही होता है सिर्फ मन, मस्तिष्क और आत्मा बहुत गंभीर रूप से घायल होती है ।भीषण आंतरिक चोटें पहुंचती हैं और हम कोई रेस्क्यू नहीं कर पाते हैं ।
“हमारी जिंदगी की ए.बी.सी हैं – नो ओवर रिएक्शन, डीप कन्सेनट्रेशन, सिंक्ड अंडरस्टैंडिंग ।” यही हमको एक्सिडेंट होने से बचा पाएंगे ।
“अक्सर जब परिस्थतियां विपरीत होती हैं तब हमको ये सब बातें बेशक बनावटी और किताबी लगती हों और समझ में नहीं आती हैं । लेकिन यही सच्चाई है ।”
आंतरिक चोटों से ग्रस्त होने से हम ओवर रिएक्शन कर बैठते हैं और हमारे अंदर का इंसान खत्म हो जाता है । सिर्फ कटुता भरे और नेगेटिव विचार से ग्रस्त इंसान जन्म ले लेता है जो न तो उन विचारों को अपने ( अच्छे इंसान वाले थिंक टैंक में या ) सबकॉन्सिस में जाने देता है और न ही रिलेशनशिप के सिद्धांत को समझ पता है और एक-एक इंसान एवं रिश्ता ख़त्म होता चला जाता है । ऐसे इंसान को लगता है कि वो ही सही है हमेशा से सही है और जाने अनजाने में असहनीय चोट खुद को मार लेता है और हर उस अपने रिश्ते को चोट पहुंचा देता है जो उसको दिल से और जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं फिर दौर शुरू होता है ऐलीगेशन्स का, आरोपों और प्रत्यारोपों का और फिर एक दूसरे को नीचा दिखाने का एक सूत्रीय कार्यक्रम शुरू हो जाता है । कई लोग इसमें मानसिक और आत्मिक रूप से आहत होते हैं, ज़ख़्मी होते हैं । सब कुछ अनरेस्क्यूएबल व अनकॉन्सिवेबल हो जाता है ।
बचपन से लेकर आज तक हम इस तरह के एक्सिडेंट करते चले आये हैं या हमारे साथ होते चले आये हैं ।
जब व्यक्ति इमोशनली टूटा हुआ होता है और दयनीय परिस्थितियों में फंसा हुआ होता है तब वो क्रिएटिव नहीं रह पता है और हमेशा डर के साये में जीता है । किसी पर भी विश्वास नहीं कर पता है । भले ही वो व्यक्ति न कहे खुद को मजबूत दिखाने का प्रयास करता है लेकिन उसके क्रिया कलापों से महसूस होने लगता है ।
वह व्यक्ति हर चीज़ को अक्सर अपनी प्रिओरिटीज़ के पैरामीटर पर रखकर सोंचता है । यहीं गलती हो जाती है । जरुरी नहीं होता है कि आपकी जो प्रिओरिटीज़ हों वो सामने वाले की भी हों ।
अक्सर मैंने सुना है लोगों को कि अगर उसने ऐसा न किया होता तो मैंने ऐसा कर दिया होता वैसा कर दिया होता तो…. ! अगर मुझे 5 साल पहले मौका मिल गया होता तो….. ! मेरी बीबी काश अच्छी होती तो….! मुझे फलां कोर्स करने को मिल जाता तो…. ! मैने शादी करके ज़िन्दगी ख़राब कर ली नहीं तो….! उसने धोखा दे दिया नहीं तो….! उसने मेरी सेल्फ रेस्पेक्ट को नुक़सान पहुंचा दिया मैं तो उसकी…..! मुझे यूज़ कर रहा था काश मुझे समझ आ गया होता तो…..बग़ैरा-बग़ैरा ।
अगर मुझे इसने बेबकूफ बना दिया तो ! परफॉर्म नहीं कर पाया तो ! इसने मुझसे अपना कमिटमेंट तोड़ दिया तो ! बॉस ने नौकरी से निकाल दिया तो ! मेरी टांग टूट गयी तो ! उन्होंने मुझे पसंद करना बंद कर दिया तो ! मेरा दिमाग आउट ऑफ़ आर्डर हो गया तो ! ऐसे तमाम डर भरी सम्भावनाओं से परेशान होते रहते हैं ।अपनी मैकेनिज़्म को नहीं संभालते हैं और सामने वाले की मैकेनिज़्म पर शक, अविश्वास और डर ज़ाहिर करते हैं ।
मैं दुनिया का सर्वश्रेष्ठ इंसान हूँ । मैं दुनिया का सबसे अक्लमंद इंसान हूँ । मैं दुनिया को बदल सकता हूँ । मैं जो कर सकता हूँ वह कोई और नहीं कर सकता है, जैसे बहुत सारे मुग़ालते अपने अंदर पाल लेते हैं जो आत्म-सुधार के बिना सिर्फ ग़लतफ़हमियां ही हैं।
जरुरत है आत्म-सुधार की बिना किसी पूर्वग्रह से पीड़ित होकर ।
जरुरत है ए.बी.सी को डेवेलोप करने की अपने मन में और मस्तिष्क में ।
जरुरत है अपने ऐसे डर को दूर भगाने की जो नकारात्मक संभावनाओं के नेगेटिव तैयार कर देते हैं ।
जरुरत है मानसिक वेलनेस देने की, अपने विचारों में से नकारात्मक परिवर्तनों को निकाल फेंकने की और उखाड़ फेंकने की ।
“अन्यथा एक दिन एक और आइसक्रीम विध मिसलेनीयस फ्लेवर के साथ पिघल जायेगी ।”
“जो लाखों करोड़ो लोगों के जीवन में मिठास घोल सकती थी !”
“जो आपको को अनमोल बना सकती थी और जीवन को अमर बना देती !”
मित्रों इस इम्मोर्टेलिटी, वैलनेस और सोशल ए. बी. सी. की मैकेनिज्म को डेवेलोप करने और उपयोग करने के लिए सीखना पड़ेगा । इसकी बहुत जरुरत है समाज को । आप ही वो इंसान हो सकते हैं जो सोशल मैकेनिज्म की नई परिभाषा गढ़ सकते हैं रच सकते हैं बना सकते हैं । विश्व पटल पर अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखवा सकते हैं ।
“अब मुझे एक बात हमेशा याद रहती है और अमल करता हूँ कि अगर आपका निजी जीवन और इमोशन्स खुशहाली से भरपूर हैं तभी आप सामाजिक और आर्थिक रूप से कामयाब होते हैं ।”
मेरा तो यही उद्देश्य है कि अपने और आपके जीवन में परिवर्तन ला सकूँ । मुझे ह्रदय से ख़ुशी होगी और गर्व की अनुभूति मिलेगी अगर अपना और आपका जीवन बदल पाने में कामयाब हुआ तो !
आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं मेरे इस अभियान का हिस्सा बन सकते हैं, मिस्ड कॉल देकर या मेल से ।
वैलनेस मूवर
डॉ. यू . सिंह
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